पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू के सत्संग-कथा प्रसंग
एक लड़के को उसके पिता ने कहाः
"अन्दर कमरे में जाकर जाँच कर कि वहाँ कितने व्यक्ति सत्संग सुनने के लिए बैठे हैं और कितने लोग उपदेश दे रहे हैं।"
वास्तव में तो एक ही उपदेशक और 50 सत्संगी बैठे थे। वे जिस कमरे में बैठे थे उसके चारों ओर की दीवारों में काँच लगे हुए थे। लड़के ने सभी मनुष्यों को देखा, परन्तु उसके साथ-साथ काँच के अन्दर उन लोगों के प्रतिबिम्ब भी देखे। गिनती करके वह अपने पिता के पास गया और बोलाः
"पिताजी ! दो उपदेशक और सौ सत्संगी बैठे हैं।"
उसके पिता तो सत्य हकीकत जानते ही थे, परन्तु कुछ बोले नहीं। जब सत्संगी चले गये और कमरा खाली हो गया तब पिता बेटे को लेकर अन्दर गये और कहने लगेः
"देख, अन्दर कितने लड़के हैं?"
बेटे ने जवाब दियाः "दो।"
उसके पिता ने कहाः "जा, दूसरे लड़के को यहाँ बुला ला।"
बेटे ने जाकर दूसरे लड़के को पकड़कर लाने की खूब कोशिश की परन्तु दूसरा लड़का वहाँ हो तो पकड़ लाए ना !
अन्त में उसने काँच को जोर से धक्का मारा तो काँच टूट गया और दिखता हुआ दूसरा लड़का भी गायब हो गया। उसने जाकर पिता से कहाः
"मैं ही था, दूसरा कोई लड़का नहीं था।"
तब पिता ने उसे समझायाः
"दूसरा लड़का कोई नहीं था, तू ही था। काँच में तेरा ही प्रतिबिम्ब दिख रहा था। जो उपदेशक भी तुझे दो दिखे वे भी दो न थे और सत्संगी भी सौ न थे, परन्तु उन लोगों के प्रतिबिम्बों को तूने काँच में देखा इसीलिए तुझे सब दुगने दिखे।"
इसी प्रकार इस संसार में भी यह सब एक का ही प्रतिबिम्ब है। तुमसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है, परन्तु शरीर को ‘मैं’ मानने की भ्रान्ति के कारण यह सब विविधता दिख रही है।
एक बार उल्लुओं की पंचायत इकट्ठी हुई। उन लोगों ने एक दूसरे से पूछाः
"तुममें से किसी ने सूर्य को देखा है?"
भला उनमें से किसी ने सूर्य को देखा हो तो ‘हाँ’ कहे न ! उन लोगों ने निश्चय किया कि सूर्य जैसा कुछ है ही नहीं। ऐसी ही दशा अज्ञानी जीवों की है। वे लोग भी ईश्वर के लिए कहते हैं- "ईश्वर जैसा कुछ नहीं है।"
वे लोग इस जगत को ही सत्य समझ रहे हैं।
अपने आपको भूल के हैरान हो गया।
माया के जाल में फँसा वैरान हो गया।।